आनंद पुर साहिब मता ओर आज

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*”एक संत जो सिपाही था”*

भिंडरावाला”
ये शब्द मैंने पहली बार सन 2007 में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान पढ़ा या सुना तत्कालीन सरकार के एक मंत्री ने गुर्जर आरक्षण आंदोलन के नेता कर्नल किरोड़ी सिंघ बैंसला जी को अपमान स्वरूप  भिंडरावाला कहा था।
जिसका जवाब देते हुए आदरणीय कर्नल किरोड़ी सिंघ बैंसला जी ने कहा था की अगर कोम के हक अधिकारो के लिए लड़ना, हमारी नस्ल और उसकी सभ्यता के लिए लड़ना भिंडरावला बनना है तो फिर सरकार मुझ पर राजद्रोह का केस दर्ज करे क्योंकि में अपनी कोम के लिए किसी भी हद तक जा सकता हूं चाहे मेरी जान ही क्यों नहीं चली जाये।
उस वक्त ये भिंडरावाला शब्द अखबारों में पढ़ा और मिडिया द्वारा सुना भी पर उस वक्त मुश्किल से 13 साल की उम्र रही होगी तो ये शब्द भूल सा गया था वैसे भी 8 वी क्लास में पढ़ने वाले बच्चे को ये पहली बार सुना शब्द कहा तक याद रहता।
उसके बाद ये शब्द मेने 2015 में पटेल आरक्षण आंदोलन के नेताओं और पर्दशनकारियो के लिए मिडिया और सरकार के समर्थित लोग प्रयोग कर रहे थे। इस वक्त मैं जोधपुर (राजस्थान) था । एक समझदार युवा था जो सरकारी नोकरी में था।
इस बार मेने इस शब्द के बारे मै जानकारी जुटानी शूरू की तो पता चला भिंडरावला कोइ व्यक्ती थे और उनका पूरा नाम जंनरेल सिंघ भिंडरावाला था हालांकि बाकी जानकारी नकारात्मक थी। वो यह थी कि इस व्यक्ती ने पंजाब को अलग देश खालिस्तान बनाने की लडाई शूरू करी थी। इससे ज्यादा मुझे नहीं लगता पंजाब से सुदूर राजस्थान में कोई और जानकारी आज भी इनके बारे में रखता हो । इसके बाद मेरा जोधपुर (राजस्थान) से ट्रांसफर रेवाड़ी (हरियाणा) हो गया
अगली बार ये नाम फिर मिडिया सुर्खियो में आया साल 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियो को सरकार समर्थित लॉबी भिंडरावाले की ओलादे कह रहे थे, सोसल मीडिया पर लिख भी रहे थे।
अबकी बार इस व्यक्तित्व के बारे मै और जानकारी जुटाने का प्रयास किया। कुछ ऑनलाइन मिला कुछ हमारे साथ ड्यूटी कर रहे एक रिटायर्ड फाेजी से मिली। अब तक जो जानकारी जुटी वो यह थी की वो अपनी कोम और अपनी धरती एवम् गुरुमत के लिए राज का बागी था।
इसके बाद कभी कभी आदिवासी आंदोलनों को लीड कर रहे आदिवासी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए सरकार समर्थित लॉबी द्वारा ये शब्द दिया जाता रहा और मिडिया द्वारा मुझ तक पंहुचता रहा फिर एक बार 2018 में मराठा आरक्षण आंदोलन में उसके नेतृत्व को इसी शब्द से नवाजा गया।
अब तक मुझे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का बोध हो चूका था। तो इन तमाम घटनाओं का आकलन और इनके विरोध में दिया जानें वाला टैग भिंडरावाला का सब का एक साथ विश्लेष्ण किया तो पाया कि सरकार (व्यवस्था को कब्जाई बैठा एक समुदाय जो पूर्व की तरफ से इस देश में आया है और वो बहुत ही क्रूर नस्ल के लोग हैं)और सरकार समर्थित लॉबी के लिए हर वो व्यक्ती भिंडरावाला है जो अपनी कोम, अपनी धरती, अपनी नस्ल और अपनी सभ्यता को बचाने की लडाई लड़ रहा हो या फिर इनके हक अधिकारो की आवाज़ बन रहा हो या फिर इन पर हुए अत्याचारों के खिलाफ़ लड़ रहा हो।
अब तक संत जनरेल सिंघ भिंडरावाला जी तो समझ आ गए थे पर उनकी लड़ाई क्या थी ?
कैसी थी ?
किन से थी ?
और क्यो थी ?
ये अभी भी समझ नहीं आया था।
ये समझ में आया जब 2021 में किसान आंदोलन में 2 साल बॉर्डर पर पंजाब से आए युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओ से चर्चा परिचर्चा में।
संत जी को जाना, उनकी मांग सिरी आनंदपुर साहिब रेजुलेशन जिसे पंजाब की आम बोल चाल में
आनंदपुर मता भी कहते हैं को पढ़ा।
आप बिना आनंदपुर साहिब मता पढ़े संत जी का निष्पक्ष विश्लेष्ण नही कर सकते
क्या है सिरी आनंदपुर साहिब रेजुलेशन या आनंदपुर मता ?
आनन्दपुर का मता संक्षेप में ! Anandpur Sahib Resolution in brief .

#मता_1. हिन्दोस्तान कई सभ्यताओं , संस्कृतियों और भाषाओं  का एक अद्भुत संगठन और गणराज्य है !
सांस्कृतिक और भाषाई हक़ों को महफूज करने के लिए , लोकतंत्र को बरकरार रखने के लिए और देश की आर्थिक उन्नति का मार्ग सरल बनाने के लिए यह जरूरी हो गया है कि भारतीय संविधान को असली फ़ेडरल रूपरेखा दे दी जाए ताकि देश की एकता और अखंडता को किसी एक कौम के लिए सरकार के पक्षपाती व्यवहार से खतरा ना हो और सूबे अपनी अपनी संस्कृति सुरक्षित रख सकें !
जिसके तहत संचार , मुद्रा , विदेश नीति और रक्षा के हक़ केंद्र सरकार अपने पास रखे और बाकी हक़ देश की प्रांतीय सरकारों को दे दिए जाएं !

पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा की गई ज्यादतियां और इमरजेंसी में हुई नाइंसाफी के बारे में आयोग गम्भीरतापूर्वक विचार करे !

हरियाणा , हिमाचल और जम्मू के पंजाबी भाषी हिस्सों को पंजाब में मिलाया जाए और चंडीगढ़ इस पंजाब की राजधानी हो !

#मता_2. पंजाब के हेड वर्कर्स का प्रबंध ज्यों का त्यों पंजाब के पास ही रखा जाए !

इस सम्बंध में पंजाब में पुनर्गठन एक्ट में संशोधन किया जाए
इंदिरा गांधी द्वारा रावी और ब्यास के पानी की नाजायज लूट की ज्यादती पर संयुक्त राष्ट्र के नियमों के हिसाब से विचार किया जाए और पंजाब के साथ इंसाफ किया जाए !
फौज में सिख जवानों की भर्ती पर लगाई गई सीमाओं को हटाया जाए और भर्ती के एजेंडे पहले की तरह कर दिए जाएं !

उत्तरप्रदेश के तराई वाले इलाकों में भूमि सुधार कानून की आड़ में किसानों के साथ हुई नाइंसाफी पर विचार किया जाए
सेंट्रल गाइडलाइन के अनुसार सीलिंग एक्ट में संशोधन करके उत्तरप्रदेश के किसानों को न्याय दिया जाए !

सरमायदारों को कोई भी आर्थिक या राजनैतिक हक़ ना दिया जाए , भूमिहीन किसानों , गरीब किसानों , मजदूरों और शहरी गरीबों के लिए रोजगार में आरक्षण हो और आने वाले दस साल में बेरोजगारी से निपटने के लिए ही प्रोग्राम  किए जाएं !
टैक्स का बोझ गरीब किसान मजदूर से हटाकर पूंजीपतियों और रईसों का सिर पर ही रखा जाए और राष्ट्रीय दौलत को समाज के गरीब तबके में बांटा जाए !

#मता_3.अमृतसर को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाया जाए , जिससे विदेशों में रह रहे सिखों का दरबार साहब की हुजूरी में शामिल होना आसान हो और लुधियाना में भी एक स्टॉक मार्केट खोला जाए , जिससे पंजाब भी गुजरात और महाराष्ट्र की तरह आर्थिक उन्नति कर सके !
खेतीबाड़ी की समान कीमतें और उसूल कच्चे माल पर भी लागू किये जाएं !

#मता_4. तिजारती फसल जैसे कपास , गन्ना और तेल वाली फसलों की व्यापारियों द्वारा लूट को रोका जाए और सरकार द्वारा इनकी अधिक से अधिक खरीद के प्रबंध किए जाएं !
सीड्यूल्ड ट्राइब्स और दबे कुचले वर्ग की आर्थिक उन्नति के लिए अलग से फन्ड रखे जाएं !

#मता_5. भूमि सुधार कानूनों की कमियों को दूर किया जाए और खेती को बढ़ावा देने के लिए कर्ज की सहूलियतें बढ़ाई जाएं और खेती उपकरणों की कीमतों को घटाया जाए
देश के पढ़े लिखे बेरोजगार नौजवानों को बेरोजगारी भत्ता दिया जाए !

#मता_6.जम्मू कश्मीर में आए वो शरणार्थी जो अपनी जमीनें पाकिस्तान में छोड़ आए , सरकारों ने उनके क्लेम अब तक पास नहीं किये हैं , जिनको तुरन्त प्रभाव से पास किया जाए !
पंजाब से बाहर के राज्य , जिनमें सिख माइनॉरिटी में हैं , वहां सिखों की शासन प्रशासन में भागीदारी फिक्स की जाए !

#मता_7. आधुनिक कृषि यंत्रों के चलते देश आत्मनिर्भरता की और बढ़ रहा है लेकिन वो यंत्र गरीब किसानों की पहुंच से दूर हैं , इसलिए ट्रेक्टर से एक्साइज ड्यूटी हटाई जाए ताकि साधारण किसान भी खेती के जरिये देश की उन्नति का साझेदार बन सके !
मजदूर की कम से कम तनख्वाह के एक्ट में संशोधन किया जाए !

#मता_8. विदेशों में बस रहे सिखों की मांग अनुसार दरबार साहब परिसर में ब्रॉडकास्ट की व्यवस्था की जाए !
इस ब्रॉडकास्ट में जितना खर्च आएगा सब धार्मिक एंटिटी द्वारा वहन किया जाएगा , सरकार से एक पैसा भी नहीं लिया जाएगा और ब्रॉडकास्ट पर पूरा नियंत्रण भारत सरकार का होगा !

#मता_9. हिन्दू विरासत एक्ट में संशोधन करके लड़कियों को पिता की जागीर में हक़ ना देकर ससुर की जायदाद में हक़ दिया जाए , ताकि आपसी मनमुटाव के चलते किसी की हकमारी ना हो !

#मता_10. किसानों की खेती योग्य जमीन को वेल्थ टैक्स के दायरे से पूरी तरह बाहर किया जाए !

#मता_11. पिछड़े वर्ग के लिए अलग से मंत्रालय बनाया जाए !
इसमें अलग देश, या खालिस्तान का कही जिक्र भी नहीं है फिर भी सिस्टम द्वारा उन्हे खालिस्तानी के रुप में स्थापित किया गया है । जून 1984 को सिरी दरबार साहिब अमृतसर में जो हुआ । उससे पहले संत जी ने कभी भी खालिस्तान की मांग नही की उनकी मांग सिरी आनंदपुर साहिब रेजुलेशन की मांग थी । उनके अन्तिम इंटरव्यू में वो खालिस्तान के लिए कहते हैं
” हम खालिस्तान नही मांगते लेकीन अगर बीबी (तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी) देती है तो मना भी नहीं करते और अगर सरकार दरबार साहिब  पर हमला करती है तो उस दिन खालिस्तान की नींव रखी जायेगी।
आज संत जी का शहीदी दिवस है।
अगर देश के इतिहास में जून 1984 नही हुई होती तो इस देश में आज किसान मजदूर आदिवासियों की सरकार होती।
और इस विश्लेष्ण के अंत में हम समीक्षा करते हैं कि जून 1984 क्यो हुआ ? तो वो यह है की
इस देश में ऐतिहासिक रूप से दो सभ्यताओं के बीच आपसी संघर्ष रहा जो आज भी है एक तरफ यहा के मूल कबीलों की सभ्यता है जो अपने अपने क्षेत्रों में शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के साथ रह रहे थे। इनमे स्वतन्त्रता, समानता बंधुत्व और न्याय जैसे मानवीय मूल्य थे तो दूसरी तरफ पूर्वी की ओर से इस देश में घुसपेठ करे साम्राज्यवादी क्रूर सोच के लोग हैं जो सबको लड़ाकर ,बांटकर संपूर्ण देश को कब्जाए हुए हैं और वो इसको बना रखने के लिए समय समय पर अलग अलग क्षेत्रो में 1947,1984,2002,2007,2016,18,21, जेसी घटनाओं को अंजाम देते रहते हैं। हमारे जितने भी पुरखे हुए उनकी लड़ाई इन लोगो से जल,जंगल,जमीन अपनी नस्ल और सभ्यता बचाने की लडाई थी और वो ही लड़ाई आज भी है। अगर हमारी कोम, हमारी जमीन, हमारी नस्ल और इसकी सभ्यता को बचाने के लिए लड़ना भिंडरावाला होना है तो हां हम सब भिंडरावाले है।
ओर एक अंतिम बात
गुजरात के गोदरा हत्याकांड पर रोना रोने वाले पंजाब के सिख कत्लेआम ओर झारखंड, छत्तीसगढ़ के आदिवासी कत्लेआम पर मोन क्यों हो जाते है । राजस्थान के गुर्जरों का कत्लेआम हो या हरियाणा के जाटों का, गुजरात के मराठों का या देशभर के दलित अत्याचार पर क्यों खामोश हो जाते है ।
याद रखना सरकार किसी भी पार्टी की रही हो
सरकार द्वारा प्रायोजित हत्याएं लोकतंत्र, संविधान ओर मानवता पर कलंक है

सत सिरी अकाल
जय जोहार

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शीशा”

एक पुण्य दानी एक गुरुमुख प्रेमी के पास गया और खूब मदहोश हो गया। लेकिन साथ में एक सूक्ष्म अहंकार भी ले गया। अब, अगर कोई गुरुमुख हो और मिलने आए व्यक्ति को अदृश्य वस्तु देकर विदा न करे, तो ऐसा तो हो नहीं सकता न? हाँ, तरीका अलग हो सकता है… दवा कड़वी हो सकती है। ऐसा ही हुआ जब उसने आकर नमस्कार किया। संगत में अपने पुण्य और दान-पुण्य का बखान करते हुए, जब उसने प्रभु की बातों में आकर कुछ संदिग्ध और विद्रोही शब्द कहे, तो उपचार आवश्यक हो गया।

“मैंने इतने महान कर्म किए हैं… मैंने आत्म-शुद्धि की है… मैंने अड़सठ तीर्थों में स्नान किया है… मैंने यह किया, मैंने वह किया… मेरे जैसा कौन है… वगैरह-वगैरह… समझो वह भगवान को जेब में रखकर घूम रहा था।” बस, दवा की एक खुराक से सब ठीक हो गया।

“एक कर्म करो मेरे प्रिय, बहुत उन्नति होगी।”

प्रगति के नाम पर वे खुश हो गए। “मुझे क्या करना चाहिए?”

“लो, एक कागज़ लो, एक कलम लो… अरे, उस कमरे में दस मिनट बैठो और जो भी मन में आए, बिना किसी हिचकिचाहट के लिखो… चाहे जो भी मतलब हो… अच्छा हो या बुरा… सच में… सब कुछ लिखना है… हर विचार। जाओ! लिखो! मैं तुम्हें बाद में बताऊँगा कि क्या करना है… बहुत प्रगति होगी, यह मेरा वादा है।” प्रेम भरे शब्द कहते हुए, प्रिय गुरु ने बाकी संगति से बात करना शुरू कर दिया।

एकांत जगह पर बैठकर, वे अपने मन में उठ रहे विचारों को ऐसे मन से लिखने लगे जो उनके दिमाग में नहीं था। कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… मैं इधर-उधर देखता कि कोई देख तो नहीं रहा कि मैं क्या लिख रहा हूँ और फिर वे लिखना शुरू कर देते। आख़िरकार, दस मिनट तक विचारों को उछालने के बाद, ‘आवाज़’ आई।

“हाँ भाई, बुद्धिमान लोग!! बस करो, चलो।”

वह झिझका और जल्दी से कागज़ घुमाकर जेब में रख लिया। उसकी ओर मुँह करके बोला,
“हाँ, भगवान।”

“अरे भाई! आप तो कितने महान उपकारक, बुद्धिमान और शुद्ध हृदय वाले हैं। आपने अपने विचारों के कागज़ को अपने ऊपर क्यों लादा? दूसरों का भी भला करो… और इसे पढ़कर, सभा में ज़ोर से बोलो…”

यह सुनते ही वह ज़मीन पर गिर पड़ा, उसके पैर काँपने लगे… उसकी ज़बान लड़खड़ाने लगी। क्या कहे और कैसे कहे? विचारों से इतना भरा हुआ? वह शर्म से भरकर उसके पैरों पर गिर पड़ा।

गुरुमुखों ने उसे प्यार से उठाया और थपथपाते हुए कहा,
“यह अफ़सोस की बात है कि वह लिख पाया… लेखक भी दुर्लभ होते हैं, लेकिन… प्रियतम! कचरा अंदर पड़ा है और तुम उसे बाहर झाड़ना जानते हो… और सिर्फ़ बाहर ही नहीं, बल्कि बाहर से झाड़कर और कचरा इकट्ठा कर रहे हो…
“तो कुछ ऐसा करो कि वह गंदा न हो।” भीतर की यात्रा करो.. आंतरिक तीर्थ में स्नान करो… भीतर से सच्चा ज्ञान प्राप्त करो… बाहर से सुने ज्ञान के प्रकाश से भीतर से अपनी आजीविका चलाओ, वरना बाहरी बौद्धिक ज्ञान, दान, पुण्य और कर्मकांड ही अहंकार पैदा करते हैं… या गुरु भला करेगा।”

फिर ये शब्द जीवन भर उसके भीतर गूंजते रहे:
“प्रियतम! कचरा अंदर पड़ा है और तुम उसे बाहर झाड़ना जानते हो..।”
“तो कुछ ऐसा करो कि गंदा न हो।”

इन शब्दों के सहारे वह आगे बढ़ता रहा।

शायद हम भी आध्यात्मिक प्रगति के इसी भ्रम में तो नहीं हैं। क्यों न एक बार लिखकर ईमानदारी से देख लिया जाए। हम रोज़ बाहर से आईना देखते हैं, कभी-कभी अंदर से भी देखते हैं। कोई नुकसान नहीं होगा, कोई नुकसान नहीं होगा। कौन है जो पढ़कर किसी को बताए। हमें अपने आत्म-दर्शन होंगे। जब सिर्फ़ वो प्रियतम बचेगा, सिर्फ़ उसके विचार ही बचे रहेंगे… और अंततः उसके विचार भी विलीन हो जाएँगे… और वही सदैव स्मृति के रूप में… ध्यान के रूप में… जीवन के रूप में और केवल तल्लीनता के रूप में रहेगा।

“जीवन भर विजेता वही रहा जिसने गलतियाँ कीं

धूल भरे चेहरे पर लगा आईना वही रहा जिसने उसे साफ़ किया”