इंसाफ का तराजू और लोकतंत्र का तकाजा

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Frankfurt Airport ( फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट) के पास एक “गाँव” जिसका नाम tribor था,,
वहां की रहने वाली एक बूढ़ी औरत ने Frankfurt international airport के ख़िलाफ़ अदालत में केस दायर कर दिया______,,

जिसकी वजह उस बूढ़ी औरत ने कुछ यूँ बयान की…
रात के वक़्त जहाज़ों का शोर ईतना ज़्यादा होता हैं कि मैं रात को सो नहीं सकती,
जिसकी वजह से अकसर मेरी तबियत ख़राब रहती हैं,,

अदालत में जज ने उस बूढ़ी औरत की पूरी बात सुनने के बाद औरत से पूछा अब आप क्या चाहती हैं ??

इस शोर के एवज़ में आप एयरपोर्ट से कुछ “मुआवज़ा” हासिल करना चाहती है या एयरपोर्ट से दूर कोई “घर” हासिल करना चाहती हैं??

औरत ने जवाब में कुछ यूँ कहा___________…
मैं यहाँ अपने ज़ाती घर में रहती हूँ,,
और बहुत टाइम से यहाँ ज़िन्दगी गुज़ार रही हूँ,,
चूँकि अब मेरी तबियत इस क़दर शोर बर्दाश्त नहीं कर सकती,,
इसलिये इस मसले का कोई और माक़ूल हल तलाश किया जाये_
और साथ यह बताया ना तो मुझे कोई पैसे की ज़रूरत हैं और ना ही मैं अपना गाँव छोड़ कर कहीं और जाना चाहती हूँ,,

इस बात से उस वक़्त की मौजूदा सरकार भी बहुत परेशान हुई कि अब इस मसले का क्या हल हो सकता हैं,,
ना तो औरत यहाँ से जाना चाहती हैं और ना इतने बड़े एयरपोर्ट को कहीं और ले जाया जा सकता है,,

एयरपोर्ट अथॉरिटी ने औरत को केस वापस ले लेने के लिये बेशुमार फ़रमाइशें पेश की,, एयरपोर्ट से दूर आलीशान घर और साथ ही एक बड़ी रक़म की भी फ़रमाईश पेश की,,
लेकिन वो बूढ़ी औरत अपने फ़ैसले से पीछे हटने को बिल्कुल भी तैयार न थी,,

आख़िरकार थक कर जज ने कहा अगर हम आपकी नींद के टाईम को मैनेज कर लें, मतलब रात का एक certain period जब आप सो रही हो तब airport पर कोई flight नहीं उतरेगी,,

क्या आपको यह फ़ैसला मंज़ूर हैं यह सुन कर वो औरत मुतमईन हो गयी________,,

…और तब से लेकर आज तक Frankfurt international airport पर रात 12 से सुबह 5 बजे तक कोई flight नहीं उतरती_

* यह हैं वो इज़्ज़त वो मक़ाम वो इंसाफ़ जो जर्मनी अपने नागरिकों को Tax payer लोगों को देता हैं,,
यहाँ हर इंसान के हुक़ूक बराबर हैं और हर एक के लिये इंसाफ़ का मेयार यकसाँ हैं________ !!

इसे कहते है नागरिक अधिकार एवं नागरिक सम्मान ! ऐसा होता है न्याय !
हमारे यहां जिनको बोलना ठीक से नहीं आता वे प्रवचन देते हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस से अधिक आज़ भी हम सोच नहीं सकते !

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शीशा”

एक पुण्य दानी एक गुरुमुख प्रेमी के पास गया और खूब मदहोश हो गया। लेकिन साथ में एक सूक्ष्म अहंकार भी ले गया। अब, अगर कोई गुरुमुख हो और मिलने आए व्यक्ति को अदृश्य वस्तु देकर विदा न करे, तो ऐसा तो हो नहीं सकता न? हाँ, तरीका अलग हो सकता है… दवा कड़वी हो सकती है। ऐसा ही हुआ जब उसने आकर नमस्कार किया। संगत में अपने पुण्य और दान-पुण्य का बखान करते हुए, जब उसने प्रभु की बातों में आकर कुछ संदिग्ध और विद्रोही शब्द कहे, तो उपचार आवश्यक हो गया।

“मैंने इतने महान कर्म किए हैं… मैंने आत्म-शुद्धि की है… मैंने अड़सठ तीर्थों में स्नान किया है… मैंने यह किया, मैंने वह किया… मेरे जैसा कौन है… वगैरह-वगैरह… समझो वह भगवान को जेब में रखकर घूम रहा था।” बस, दवा की एक खुराक से सब ठीक हो गया।

“एक कर्म करो मेरे प्रिय, बहुत उन्नति होगी।”

प्रगति के नाम पर वे खुश हो गए। “मुझे क्या करना चाहिए?”

“लो, एक कागज़ लो, एक कलम लो… अरे, उस कमरे में दस मिनट बैठो और जो भी मन में आए, बिना किसी हिचकिचाहट के लिखो… चाहे जो भी मतलब हो… अच्छा हो या बुरा… सच में… सब कुछ लिखना है… हर विचार। जाओ! लिखो! मैं तुम्हें बाद में बताऊँगा कि क्या करना है… बहुत प्रगति होगी, यह मेरा वादा है।” प्रेम भरे शब्द कहते हुए, प्रिय गुरु ने बाकी संगति से बात करना शुरू कर दिया।

एकांत जगह पर बैठकर, वे अपने मन में उठ रहे विचारों को ऐसे मन से लिखने लगे जो उनके दिमाग में नहीं था। कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… मैं इधर-उधर देखता कि कोई देख तो नहीं रहा कि मैं क्या लिख रहा हूँ और फिर वे लिखना शुरू कर देते। आख़िरकार, दस मिनट तक विचारों को उछालने के बाद, ‘आवाज़’ आई।

“हाँ भाई, बुद्धिमान लोग!! बस करो, चलो।”

वह झिझका और जल्दी से कागज़ घुमाकर जेब में रख लिया। उसकी ओर मुँह करके बोला,
“हाँ, भगवान।”

“अरे भाई! आप तो कितने महान उपकारक, बुद्धिमान और शुद्ध हृदय वाले हैं। आपने अपने विचारों के कागज़ को अपने ऊपर क्यों लादा? दूसरों का भी भला करो… और इसे पढ़कर, सभा में ज़ोर से बोलो…”

यह सुनते ही वह ज़मीन पर गिर पड़ा, उसके पैर काँपने लगे… उसकी ज़बान लड़खड़ाने लगी। क्या कहे और कैसे कहे? विचारों से इतना भरा हुआ? वह शर्म से भरकर उसके पैरों पर गिर पड़ा।

गुरुमुखों ने उसे प्यार से उठाया और थपथपाते हुए कहा,
“यह अफ़सोस की बात है कि वह लिख पाया… लेखक भी दुर्लभ होते हैं, लेकिन… प्रियतम! कचरा अंदर पड़ा है और तुम उसे बाहर झाड़ना जानते हो… और सिर्फ़ बाहर ही नहीं, बल्कि बाहर से झाड़कर और कचरा इकट्ठा कर रहे हो…
“तो कुछ ऐसा करो कि वह गंदा न हो।” भीतर की यात्रा करो.. आंतरिक तीर्थ में स्नान करो… भीतर से सच्चा ज्ञान प्राप्त करो… बाहर से सुने ज्ञान के प्रकाश से भीतर से अपनी आजीविका चलाओ, वरना बाहरी बौद्धिक ज्ञान, दान, पुण्य और कर्मकांड ही अहंकार पैदा करते हैं… या गुरु भला करेगा।”

फिर ये शब्द जीवन भर उसके भीतर गूंजते रहे:
“प्रियतम! कचरा अंदर पड़ा है और तुम उसे बाहर झाड़ना जानते हो..।”
“तो कुछ ऐसा करो कि गंदा न हो।”

इन शब्दों के सहारे वह आगे बढ़ता रहा।

शायद हम भी आध्यात्मिक प्रगति के इसी भ्रम में तो नहीं हैं। क्यों न एक बार लिखकर ईमानदारी से देख लिया जाए। हम रोज़ बाहर से आईना देखते हैं, कभी-कभी अंदर से भी देखते हैं। कोई नुकसान नहीं होगा, कोई नुकसान नहीं होगा। कौन है जो पढ़कर किसी को बताए। हमें अपने आत्म-दर्शन होंगे। जब सिर्फ़ वो प्रियतम बचेगा, सिर्फ़ उसके विचार ही बचे रहेंगे… और अंततः उसके विचार भी विलीन हो जाएँगे… और वही सदैव स्मृति के रूप में… ध्यान के रूप में… जीवन के रूप में और केवल तल्लीनता के रूप में रहेगा।

“जीवन भर विजेता वही रहा जिसने गलतियाँ कीं

धूल भरे चेहरे पर लगा आईना वही रहा जिसने उसे साफ़ किया”