अवतार सिंह गिल

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“ये कौन से काम में पड़ गया है तू? ये भांड-मिरासियों वाला काम है। हमारे खानदान में किसी ने नहीं किया। ये क्या करके आया है तू?” ये बात अवतार गिल जी की मां ने उनसे तब कही थी जब उन्होंने कॉलेज का थिएटर ग्रुप जॉइन करने के लिए अपने बाल कटा दिए थे। ये क्या कहानी है, चलिए विस्तार से जानते हैं।

उन दिनों अवतार गिल पगड़ी बांधा करते थे। उन्होंने अपने केश नहीं कटाए थे तब तक। मरहूम एक्टर जावेद खान अमरोही और डायरेक्टर रमन कुमार इनके क्लासमेट थे। जबकी डायरेक्टर रमेश तलवार इनके सीनियर थे। रमेश तलवार उस ज़माने में यश चोपड़ा के असिस्टेंट भी हुआ करते थे। और रमेश तलवार कॉलेज में होने वाले नाटकों को भी डायरेक्ट करते थे। अपने दूसरे साथियों को नाटक में काम करते देखकर अवतार गिल जी भी बड़े उत्साहित होते थे। और रमेश तलवार व जावेद खान अमरोही से कहते थे कि मैं भी नाटकों में काम करना चाहता हूं।

वो लोग मज़ाक करते हुए अवतार गिल जी से कहते थे कि तुमने कभी कोई सरदार एक्टर देखा है? एक्टर बनना है तो तुम्हें बाल कटाने होंगे। अब वो लोग तो मज़ाक करते थे। मगर अवतार गिल गंभीर हो गए। घर जाकर ये अपनी मां से बाल कटाने के बारे में डिस्कस करने लगे। मां चेतावनी देते हुए कहती थी कि अगर तूने बाल कटाए तो तेरे पिताजी तुझे और मुझे पहले पीटेंगे, फिर घर से निकाल देंगे। मगर एक्टिंग करने के लिए बेकरार अवतार गिल मां से ज़िद करते हुए कहते थे कि मैं तो बाल ज़रूर कटाऊंगा। करीब एक साल तक अवतार गिल अपनी मां से कहते रहे कि मैं आज बाल कटाने जा रहा हूं। कल बाल कटाने जा रहा हूं।

फिर एक दिन आखिरकार अवतार गिल ने अपने बाल कटा ही लिए। हालांकि दाढ़ी नहीं कटाई। जब ये घर पर आए तो पगड़ी इन्होंने सिर पर ही रखी हुई थी। घर आकर जब इन्होंने अपनी पगड़ी उतारी तो इनकी बड़ी बहन और छोटी बहन इन्हें देखकर हंसने लगी। मां ने देखा तो वो भी पहले हैरान हुई, फिर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी। फिर अचानक मां ने सबको चुप कराया और वो अवतार गिल को डांटने लगी। और वो सब बातें कही जो आपने शुरू में पढ़ी हैं। अवतार गिल मां से रिक्वेस्ट कर रहे थे कि अब पापा को आप संभाल लीजिएगा।

आखिरकार जब अवतार गिल के पिता ने इनके बाल कटे देखे तो वो कुछ नहीं बोले। ना ही उन्होंने इन पर हाथ उठाया। मगर पूरे छह महीने तक उन्होंने अवतार गिल से बात नहीं की। अवतार गिल अगर उनसे बात करने की कोशिश करते, उनके पास जाकर बैठते तो वो उठकर दूसरे कमरे में चले जाते थे। पिता के बटुए में अवतार गिल की एक तस्वीर भी हुआ करती थी। पिता ने वो भी फाड़कर फेंक दी थी। पिता का बात ना करना अवतार गिल को बहुत खलता था। मन ही मन वो बहुत बेचैन रहने लगे थे। पिता की चुप्पी हर दिन किसी भाले की तरह इनके दिल में चुभती थी।

बाल कटाने के बाद ही अवतार गिल ने अपने कॉलेज का ड्रामा ग्रुप जॉइन कर लिया था। और कुछ नाटकों में एक्टिंग भी वो कर चुके थे। फिर जिस दौरान अवतार गिल के पिता को इनसे बात ना करते हुए लगभग छह माह का समय हो चुका था, उसी दौरान इनके कॉलेज में एक नाटक का मंचन होने वाला था। अवतार गिल भी उस नाटक में काम करने वाले थे। इन्होंने अपनी मां से रिक्वेस्ट करते हुए कहा कि किसी तरह पिताजी को वो नाटक दिखाने कॉलेज ले आईए। मां ने वैसा ही किया। नाटक वाले दिन मां जैसे-तैसे इनके पिता को मनाकर इनके कॉलेज ले गई।

उस दिन पहली दफ़ा अवतार गिल के पिता ने इन्हें स्टेज पर नाटक करते देखा। नाटक खत्म होने के बाद अवतार गिल जी को सैकेंड बेस्ट एक्टर अवॉर्ड दिया गया। वो अवॉर्ड लेकर जब अवतार गिल अपने पिता के पास आए तो पिता ने उस दिन इनसे बात की। और कहा कि जो करना है करो। मगर गंभीरता से करो और पूरी मेहनत से करो। पिताजी की वो बात सुनकर अवतार गिल जी बहुत खुश हुए। कई महीनों से दिल पर पड़ा बोझ हल्का हो गया।

आज अवतार गिल जी का जन्मदिन है साथियों। 13 मई 1950 को अवतार गिल साहब का जन्म हुआ था। विकीपीडिया इनके जन्म की तारीख़ 14 मई बताता है। लेकिन वो शायद गलत है। और अगर सही भी हुई तो कोई बात नहीं। एक दिन पहले अवतार गिल जी को हम शुभकामनाएं दे देते हैं। ऊपर की तस्वीर में आप अवतार गिल जी के पिता को उनके साथ देख सकते हैं। बड़े बेहतरीन अभिनेता हैं अवतार गिल जी। जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

अवतार गिल बताते हैं कि जब वो कॉलेज में नाटकों से जुड़ चुके थे उस वक्त उनके मन में भारतीय वायुसेना में जाने का ख्याल भी आया था। वायुसेना में जाने की इच्छा जब अवतार गिल ने अपनी मां से बताई तो मां ने मना कर दिया। दरअसल, कुछ महीने पहले ही सन 1971 की भारत-पाक जंग खत्म हुई थी। इनकी मां ने इनसे कहा था कि मेरा एक ही बेटा है। उसे मैं फौज में कैसे भेज दूं। तुम कुछ और काम करना। एयरफ़ोर्स का इरादा छोड़ दो। अवतार गिल जी ने अपनी मां की बात मानी और एयरफ़ोर्स में जाने का विचार त्याग दिया। उन्होंने पूरा ध्यान एक्टिंग पर लगा दिया और फ़ैसला कर लिया कि वो अब एक्टर ही बनेंगे। और वो एक्टर बने भी। #AvtarGill #happybirthday

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शीशा”

एक पुण्य दानी एक गुरुमुख प्रेमी के पास गया और खूब मदहोश हो गया। लेकिन साथ में एक सूक्ष्म अहंकार भी ले गया। अब, अगर कोई गुरुमुख हो और मिलने आए व्यक्ति को अदृश्य वस्तु देकर विदा न करे, तो ऐसा तो हो नहीं सकता न? हाँ, तरीका अलग हो सकता है… दवा कड़वी हो सकती है। ऐसा ही हुआ जब उसने आकर नमस्कार किया। संगत में अपने पुण्य और दान-पुण्य का बखान करते हुए, जब उसने प्रभु की बातों में आकर कुछ संदिग्ध और विद्रोही शब्द कहे, तो उपचार आवश्यक हो गया।

“मैंने इतने महान कर्म किए हैं… मैंने आत्म-शुद्धि की है… मैंने अड़सठ तीर्थों में स्नान किया है… मैंने यह किया, मैंने वह किया… मेरे जैसा कौन है… वगैरह-वगैरह… समझो वह भगवान को जेब में रखकर घूम रहा था।” बस, दवा की एक खुराक से सब ठीक हो गया।

“एक कर्म करो मेरे प्रिय, बहुत उन्नति होगी।”

प्रगति के नाम पर वे खुश हो गए। “मुझे क्या करना चाहिए?”

“लो, एक कागज़ लो, एक कलम लो… अरे, उस कमरे में दस मिनट बैठो और जो भी मन में आए, बिना किसी हिचकिचाहट के लिखो… चाहे जो भी मतलब हो… अच्छा हो या बुरा… सच में… सब कुछ लिखना है… हर विचार। जाओ! लिखो! मैं तुम्हें बाद में बताऊँगा कि क्या करना है… बहुत प्रगति होगी, यह मेरा वादा है।” प्रेम भरे शब्द कहते हुए, प्रिय गुरु ने बाकी संगति से बात करना शुरू कर दिया।

एकांत जगह पर बैठकर, वे अपने मन में उठ रहे विचारों को ऐसे मन से लिखने लगे जो उनके दिमाग में नहीं था। कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… कभी हिचकिचाते… मैं इधर-उधर देखता कि कोई देख तो नहीं रहा कि मैं क्या लिख रहा हूँ और फिर वे लिखना शुरू कर देते। आख़िरकार, दस मिनट तक विचारों को उछालने के बाद, ‘आवाज़’ आई।

“हाँ भाई, बुद्धिमान लोग!! बस करो, चलो।”

वह झिझका और जल्दी से कागज़ घुमाकर जेब में रख लिया। उसकी ओर मुँह करके बोला,
“हाँ, भगवान।”

“अरे भाई! आप तो कितने महान उपकारक, बुद्धिमान और शुद्ध हृदय वाले हैं। आपने अपने विचारों के कागज़ को अपने ऊपर क्यों लादा? दूसरों का भी भला करो… और इसे पढ़कर, सभा में ज़ोर से बोलो…”

यह सुनते ही वह ज़मीन पर गिर पड़ा, उसके पैर काँपने लगे… उसकी ज़बान लड़खड़ाने लगी। क्या कहे और कैसे कहे? विचारों से इतना भरा हुआ? वह शर्म से भरकर उसके पैरों पर गिर पड़ा।

गुरुमुखों ने उसे प्यार से उठाया और थपथपाते हुए कहा,
“यह अफ़सोस की बात है कि वह लिख पाया… लेखक भी दुर्लभ होते हैं, लेकिन… प्रियतम! कचरा अंदर पड़ा है और तुम उसे बाहर झाड़ना जानते हो… और सिर्फ़ बाहर ही नहीं, बल्कि बाहर से झाड़कर और कचरा इकट्ठा कर रहे हो…
“तो कुछ ऐसा करो कि वह गंदा न हो।” भीतर की यात्रा करो.. आंतरिक तीर्थ में स्नान करो… भीतर से सच्चा ज्ञान प्राप्त करो… बाहर से सुने ज्ञान के प्रकाश से भीतर से अपनी आजीविका चलाओ, वरना बाहरी बौद्धिक ज्ञान, दान, पुण्य और कर्मकांड ही अहंकार पैदा करते हैं… या गुरु भला करेगा।”

फिर ये शब्द जीवन भर उसके भीतर गूंजते रहे:
“प्रियतम! कचरा अंदर पड़ा है और तुम उसे बाहर झाड़ना जानते हो..।”
“तो कुछ ऐसा करो कि गंदा न हो।”

इन शब्दों के सहारे वह आगे बढ़ता रहा।

शायद हम भी आध्यात्मिक प्रगति के इसी भ्रम में तो नहीं हैं। क्यों न एक बार लिखकर ईमानदारी से देख लिया जाए। हम रोज़ बाहर से आईना देखते हैं, कभी-कभी अंदर से भी देखते हैं। कोई नुकसान नहीं होगा, कोई नुकसान नहीं होगा। कौन है जो पढ़कर किसी को बताए। हमें अपने आत्म-दर्शन होंगे। जब सिर्फ़ वो प्रियतम बचेगा, सिर्फ़ उसके विचार ही बचे रहेंगे… और अंततः उसके विचार भी विलीन हो जाएँगे… और वही सदैव स्मृति के रूप में… ध्यान के रूप में… जीवन के रूप में और केवल तल्लीनता के रूप में रहेगा।

“जीवन भर विजेता वही रहा जिसने गलतियाँ कीं

धूल भरे चेहरे पर लगा आईना वही रहा जिसने उसे साफ़ किया”